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Bhagwan-Vishnu-ke-10-avtar

श्रीमद्भागवत गीता में श्री कृष्ण ने कहा है कि “यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ।। परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ।।”

अर्थात जब जब धर्म की हानि और अधर्म का उत्थान हो जाता है तब तब सज्जनों के परित्राण और दुष्टों के विनाश के लिए में विभिन्न युगों में उत्पन्न होता हूँ। धर्म ग्रंथों के आधार पर नारायण में दशावतार लिए हैं। पहले तीन अवतार सतयुग में, चार अवतार त्रेता में, दो द्वापर में, और अब अंतिम अवतार कल्कि कलियुग में अवतरित होगा।

भगवान विष्णु ने विश्वकल्याण तथा धर्म की रक्षा करने के उद्देश्य से कई अवतार लिए। भगवान विष्णु ने कुल 24 अवतार लिए है, परंतु सनातन धर्म में 10 अवतार को मुख्य माना जाता है। भगवान विष्णु के 10 अवतार में के केवल श्री कृष्ण और श्री राम के विषय में लोग पूर्ण रूप से जानते है। परंतु बाक़ी अवतारों के बारे में इतना नहीं जानते। इस लेख का उद्देश्य है कि भगवान विष्णु के 10 अवतार के विषय में आपको विस्तार से बताये क्योंकि इनका हमारे धर्म पर बहुत गहरा प्रभाव है।

1.मत्स्य अवतार-

आज हम जानते हैं विष्णु जी के प्रथम अवतार मत्स्य के बारे में। युगों पहले * राक्षस ने चारों वेदों का अपहरण करके उन्हें क़ैद कर लिया था। तब पृथ्वी पर से ज्ञान विलुप्त होने लगा और असुरी शक्तियां बढ़ने लगी।

तब महादेव ने पृथ्वी को जलमग्न करने का निर्णय लिया। नई पृथ्वी की स्थापना हेतु एक मनुष्य का होना आवश्यक था। इसलिए भगवान विष्णु ने मत्स्य का अवतार लिया।

एक समय की बात है, सत्ययुग के दौरान सत्यव्रत नामक एक राजा हुआ करते थे, एक दिन हमेशा की तरह जब वह नदी में स्नान कर अर्घ दे रहे थे, तब उनके अंजलि में भरे पानी में एक मछली आ गई।

राजा सोचा कि वह उस मछली को फिर पानी में छोड़ देंगे, परंतु वह ऐसा करते इससे पहले ही वह मछली उनसे विनती करने लगी की कृपया आप मुझे इस पानी में फिर से ना डालें। मुझ पर दया कीजिए इस बड़े से जलाशय में क़द छोटा होने की वजह से बड़े जीवों से मुझे भय लगता है।

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अगर इस पानी में मैं फिर से गई तो बड़ी मछलियाँ मुझे हानि पहुँचायेगी। राजा दुविधा में पड़ गए, फिर उन्होंने उस मछली को अपने कमंडल में डाला और अपने घर ले आये। जैसे जैसे समय बीता वह मछली का अकार बढ़ता चला गया।

राजा की प्रार्थना सुन कर भगवान विष्णु राजा के सामने प्रकट हो गए और राजा से कहा कि, आज से ठीक 7 दिन बाद महाप्रलय होने वाला है। जब प्रलय होगा तब एक विशाल नाव तुम्हारे पास तुम्हारी सहायता करने आएगी। तब तुम सप्तऋषि, औषधियां, बीज और प्राणियों को साथ लेकर उस नाव में बैठ जाना।

जब वह नाव तुम्हारे आपे से बाहर हो जाएगी तब मैं मत्स्य के रूप में तुम्हें बचाने आऊँगा। फिर तुम वासुकि नाग के साथ नाव को मेरे सींग से बांध देना।

2.कूर्म अवतार-

यह श्रीहरी का दूसरा अवतार है, पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु ने समुद्र मंथन में सहायता करने के कूर्म अवतार लिया। जिसे कच्छपावतार यानी कछुए का अवतार भी कहा जाता है। एक बार की बात है, ऋषी दुर्वासा ने देवराज आई दर को एक माला भेंट की, इंद्र ने वो माला ऐरावत को को पहना दी ऐरावतने वो माला अपने पैरों तले कुचल दी।

इस बात का पता चलने पर ऋषि दुर्वासा ने सारे देवताओं को श्राप दिया की वो शक्तिहीन हो जाएंगे उसी समय दानवों ने देवताओं पर हमला कर कर दिया। शक्ति ना होने के कारण देव दानव का सामना न कर पाएँ।

विचलित हो कर सभी देव भगवान विष्णु के पास सहायता माँगने गये, तो भगवान विष्णु ने समुद्र मंथन के लिए कहा। सभी देव और दैत्यों समुद्र मंथन के लिए राजी हो गये। समुद्र मंथन के समय देवों और दैत्यों ने मन्दराचल पर्वत को मथानी तथा नागराज वासुकि को बेटी बनाया गया।

पर्वत को मंथन के हितों से उखाड़ा था परंतु नीचे कोई आधार न होने के कारण पर्वत समुद्र में डूबने लगा तब भगवान विष्णु ने कूर्म अवतार यानी कछुए के रूप में आकर अपनी विशाल पीठ पर सहारा दिया और समुद्र मंथन में सहायता की। इस प्रकार समुद्र मंथन को सफल बनाया गया।

3.वराह अवतार-

मत्स्य और कूर्म अवतार के बाद भगवान विष्णु का तीसरा अवतार है वराह। वराह मतलब शुकर। यह श्रीहरी के दस प्रमुख अवतारों में से एक अवतार है। धर्मग्रन्धों के अनुसार हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु नामक दानवों ने भगवान ब्रह्मा में प्रसन्न कर एक वरदान माँगा की प्रभु हमे ऐसा वर दीजिए जिससे इस पृथ्वी पर कोई प्राणी, कोई जानवर या देवता हमे पराजित ना कर सके और ना ही कोई मार सके। ब्रह्माजी तथास्तु कह कर अपने लोक लौट गये।

वरदान पा कर पर चारों और तबाही मचाने लगे। फिर एक बार की बात है, जब पुरातन समय में दैत्य हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को ले जाकर सागर में छिपा दिया तब ब्रह्मा की नाक से भगवान विष्णु वराह रूप में प्रकट हुए। भगवान श्री हरि के इस विशाल वराह रूप को देखकर सभी देवी-देवताओं और ऋषि-मुनियों ने उनसे प्रार्थना की। सबके आग्रह करने पर भगवान विष्णु के तीसरे अवतार भगवान वराह ने पृथ्वी को ढूंढना प्रारंभ किया।

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भगवान वराह ने अपनी विशाल थूथनी की सहायता से उन्होंने पृथ्वी का पता लगा लिया और सागर के भीतर जाकर अपने दांतों पर रखकर वे पृथ्वी को बाहर ले आए। जब दैत्य हिरण्याक्ष ने यह देखा तो उसने भगवान विष्णु के वराह रूप को युद्ध के लिए ललकारा। दोनों में भीषण युद्ध हुआ। आख़िर में भगवान वराह ने दैत्य हिरण्याक्ष का वध कर दिया और विश्व शांति का उपदेश दिया। इसके बाद भगवान वराह ने अपने खुरों से जल को स्तंभित कर उस पर पृथ्वी को स्थापित कर दिया। इसके पश्चात भगवान वराह अंतर्धान हो गए।

4.नरसिंह अवतार-

भगवान विष्णु के 10 अवतार में से एक है नरसिंह अवतार। यह अवतार भगवान विष्णु ने अपने प्रिय भक्त प्रह्लाद की रक्षा और देत्यराज हिरण्यकशिपु का वध करने के लिए धारण किया था। भगवान नरसिंह की कथा कुछ इस प्रकार है, हिरण्यकशिपु जो दैत्यों का राजा था, अपने आपको सबसे बलवान समझता था उसे ब्रह्माजी से यह वरदान मिला था कि कोई भी देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी, न दिन में, न रात में, चाहे वह धरती पर हों या आकाश में किसी भी शस्त्र या अस्त्र का उपयोग कर उसे नहीं मार सकता।

जो भी भगवान विष्णु को पूजता, हिरण्यकशिपु उसे दंड देता। परंतु उसका अपना पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का बड़ा भक्त था जब इस बात का हिरण्यकशिपु को पता चला, तब उसने प्रह्लाद को भगवान विष्णु की करने से रोका, परंतु प्रह्लाद नहीं माना। इसलिए हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन होलिका को आदेश दिया कि वह प्रह्लाद को मृत्युदंड दे।

होलिका को अग्नि से ना जलने का वरदान प्राप्त था जब वह प्रह्लाद को मृत्युदंड देने अग्नि पर जाकर बैठी प्रह्लाद टेन भी भगवान विष्णु का स्मरण कर कर रहे थे। होलिका का उस अग्नि में जल गई परंतु प्रह्लाद की भक्ति के कारण उसे कोई हानि नहीं पहुँची। प्रह्लाद को बचाने के लिए भगवान विष्णु नरसिम्हा के अवतार में एक खम्भे से बाहर आए और उन्होंने प्रह्लाद के प्राण बचाए और हिरण्यकशिपु का अपने नाखूनों से वध किया।

5.वामन अवतार- 

त्रेता युग में दैत्यराज बलि ने स्वर्गलोक पर कब्जा कर लिया था, सभी देवता असहाय थे और इस दुविधा से बाहर निकलने के लिए उन्होंने भगवान विष्णु से मदद की याचना की। देवताओं को स्वर्गलोक वापस दिलाने के लिए भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण किया। एक दिन बली रहा ने महायज्ञ का आयोजन किया तब वामन उस यज्ञ ने पहुँच गये, उन्होंने बलि से 3 पद धरती दान में माँगी।

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बली ने वामन की इच्छा का माँ रखा। तब भगवान वामन ने अपना एक पैर धरती पर रखा और दूसरा पैर स्वर्ग पर, परंतु अब तीसरा पैर रखने के लिए कोई ऐसी जगह नहीं बची थी जहाँ पर बलि का राज था। वामन क्रोधित हो गए तब बलि उनके सामने नतमस्तक हुआ और उसने वामन देव को तीसरा पग अपने सिर पर रखने के लिए कहा।

वामन देव के पैर रखने की वजह से बलि पाताल लोक में पहुँच गया। बलि के इस नेकी वामन देव ख़ुश हुए और उन्होंने उसे पाताल लोक का राजा बना दिया। इस प्रकार देवताओं को स्वर्गलोक की प्राप्ति हुई और भगवान विष्णु की पंच रूप भगवान वामन लीन हो गए।

6.परशुराम अवतार-

हैययवंश में कार्तवीर्य अर्जुन बड़ा ही प्रतापी राजा था, उसने अपने गुरु दत्तात्रेय को प्रसन्न करके वरदान के रूप में उनसे हज़ार भुजाएं प्राप्त की थी। हजार भुजाओं के कारण ही उसे सहस्त्रबाहु के नाम से भी जाना जाता है । उसे अपने अपने वैभव और शक्ति का बहुत घमंड था। उसे कई सिद्धियां भी प्राप्त थी। लंकाधिपति रावण को भी उसने बंधी बना लिया था। एक बार राजा सहस्त्रबाहु शिकार करते हुए जमदग्नी के आश्रम में पहुँच गया, जिस पर ऋषि जमदग्नी ने उनका बहुत आदर सत्कार किया, ऋषि जमदग्नी के पास कामधेनु गाय थी। उसी गाय की वजह से ऋषि जमदग्नी ने सब की अच्छी तरह से आवभगत किया।

सहस्त्रबाहु ने जब ये सब देखा तो कामधेनु गाय उसको पसंद आ गई। वह बलपूर्वक गाय को आश्रम से ले गया और जब भगवान परशुराम को यह बात पता चली तो अपने पिता की आत्म सम्मान की रक्षा के लिए वे राजा सहस्रबाहु से कामधेनु गाय वापस लेने का है जिसके बाद सहस्रबाहु और भगवान परशुराम ने युद्ध किया, जिसमें राजा की मृत्यु हो गई। इसके बाद सहस्त्रबाहु के पुत्रों ने प्रतिशोध स्वरूप जब परशुराम अनुपस्थित थे उनके उनके जमदग्नि को मार डाला। इससे विचलित होकर उनकी माता रेणुका भी जमदग्नी के साथ सती हो गई।

इस घटना से भगवान परशुराम अत्यंत क्रोधित हुए और उन्होंने यह प्रतिज्ञा की, की हैययवंश के सभी क्षत्रियों का नाश कर के ही दम लूंगा। उन्होंने सबसे पहले महिष्मति नगरी में अधिकार प्राप्त किया और उन्होंने सहस्रबाहु के सभी पुत्रों और उनका साथ देने वाले सभी क्षत्रियों का नाश किया। ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने पृथ्वी पर इक्कीस बार क्षत्रियों का विनाश किया था।

7.श्रीराम अवतार-

भगवान विष्णु के 10 अवतारों में से प्रमुख अवतार है श्री राम, भगवान श्रीराम का त्रेतायुग में जन्म हुआ। यह अवतार लेने के पीछे एक नहीं अनेक वजहें हैं। श्री राम अवतार कई वरदानों और श्रापों का सम्मिलित परिणाम है। दैत्यराज हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष दूसरे जन्म में रावण और कुंभकर्ण बनकर जन्मे।

श्रीहरी के वरदान अनुसार उनके हाथों ही हिरण्यकश्यप और हिरण्याक् उद्धार होगा, इसी वरदान के कारण श्रीराम का जन्म हुआ। साथ ही ऋषि कश्थ्य और अदिति की कठोर तप से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया, और स्वयं ही श्रीराम के रूप में प्रकट हुए। त्रेता युग में जब लंकापति रावण ने पूरी सृष्टि में आतंक मचा रखा था।

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तब भगवान विष्णु ने राजा दशरथ और रानी कौशल्या के घर जन्म लिया। परंतु उनका जीवन कई कठिनाइयों से भरा हुआ था। अपने पिता का मान रखकर राजपाट छोड़ उन्होंने अपने भाई लक्ष्मण और अर्धांगिनी माता सीता के साथ 14 साल वनवास में बितायें। उस दौरान रावण ने माँ सीता का हरण किया, जिन्हें हनुमान जी और पूरी वानर सेना की मदद से प्रभु श्री राम ने ढूंढा और इसी के साथ रावण का वध किया।

8.कृष्णा अवतार-

भगवान विष्णु के आठवे और सबसे नटखट अवतार है श्री कृष्ण, द्वापर युग में भगवान श्रीहरि ने श्री कृष्ण अवतार लिया और कई दुष्ट दानवों का नाश किया। जब सारा संसार मधुरानरेश कंस से भयभीत था, तब श्री कृष्ण ने उसका भी वध किया और संसार में शांति फैलाई। श्री कृष्ण महाभारत के दौरान, जान अर्जुन अपने मार्ग से भटक गए, तब श्री कृष्ण ने उन्हें गीता का ज्ञान दिया।

श्री कृष्ण युद्ध में अर्जुन के मार्गदर्शक और सारथि बने। उनके मार्गदर्शन से महाभारत में पाण्डवों की जीत हुयी और धर्मराज युधिष्ठिर को राजा बनाया। भगवान विष्णु के इस अवतार ने न सिर्फ धर्म का मार्ग सिखाया बल्कि प्रेम, मित्रता, भक्ति, सही अर्थ में सत्य क्या है, और जीवन जीने का वास्तविक मार्ग क्या है, यह सब से अवगत कराया।

9.बुद्ध अवतार-

पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब दानव व दैत्यों की शक्ति देवताओं पर हावी होने लगी थी। दैत्यों और देवताओं के बीच हुए युद्ध में देवता हार गये थे और स्वर्गलोक पर दानवों का राज हो गया था। सभी देव स्वर्गलोक छोड़ कर चले गये। दानवों को भी यह दर था कि कहीं देवता फिर से स्वर्गलोक पर कब्जा न कर ले, जिसके समाधान के लिए दैत्य देवराज इंद्र के पास गये और समस्या बतायी। देवराज इंद्र ने दैत्यों को यज्ञ व वेदों का आचरण करने को कहा। सभी दैत्य देवराज इंद्र की बात मानकर वेद के अनुसार आचरण करने लगे।

दानवों से भयभीत सभी देव मदद की गुहार लेकर भगवान श्रीहरी के पास पहुँचे। भगवान विष्णु के देवों से कहा कि वह उनकी मदद करने के लिए स्वयं भगवान बुद्ध का अवतार लेकर अवतरित होगे। देवों को स्वर्गलोक वापस दिलाने के लिए भगवान विष्णु ने बुद्ध अवतार लिया, उनके एक हाथ में मथानी थी और वह रास्ते पर पैर रखने से पहले रास्ते को साफ़ करते हुए आगे बढ़ रहे थे।

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भगवान बुद्ध दानवों के पास गए और उनसे यज्ञ करने के लिए मना किया। भगवान बुद्ध ने कहा कि यज्ञ करने से सूक्ष्म जीवों को जीवहानि हो जाती है। मैं ख़ुद जीव हिंसा से बचने के लिए रास्ते को साफ करके चलता हूं। दानवों को देवराज इंद्र की वेदों के राह पर चलने की बात याद आई। दानवों पर भगवान बुद्ध के उपदेशों का ऐसा असर हुआ कि उन्होंने वेद आचारण व यज्ञ करना बंद कर दिया।

ऐसा करने पर दानवों की शक्ति कम होने लगी। यह देख देवताओं ने दोबारा दानवों पर हमला कर स्वर्ग हासिल कर लिया। इस तरह भगवान बुद्ध ने सृष्टि का मंगल किया।

10.कल्कि अवतार-

धर्मग्रंथों के अनुसार, भगवान विष्णु कलयुग, के अंत में भगवान कल्कि के रूप में अवतरित होंगे। कलयुग में जब पाप हद से ज्यादा बढ़ जायेगा, तब भगवान श्रीहरी अपना दसवा अवतार लेंगे और दुष्टों का नाश करेंगे और फिर से एक नए सत्ययुग की स्थापना करेंगे। भगवान कल्कि देवदत्त नमक घोड़े पर सवार हो कर आएंगे और पापियों का नाश कर धर्म की पुनः स्थापना करेंगे। उसी के सार्थ एक नए युग का आरम्भ होगा और कलयुग समाप्त हो जायेगा।

निष्कर्ष-

भगवान विष्णु के अनेक रूप है, अनंत अवतार है, और यह सभी अवतार भौतिक जगत में समय-समय पर विभन्न कार्य करने के लिए अवतरित होते है। अवतार लेते समय भगवान विष्णु जो रूप लेते है, वो उस कार्य के लिए उपयुक्त होता है।

भगवत गीता में यह वर्णित है, की भगवान विष्णु अपनी अंतरंग शक्ति के प्रभाव द्वारा भक्तों की रक्षा तथा असुरों का नाश करने के लिए प्रकट होते है। एक भक्त को यह समझना चाहिए की भगवान विष्णु एक सथान पशु या मनुष्य के रूप में नहीं प्रकट होते, उनका वराह मूर्ति, अश्व या कछुए के रूप में प्रकट होना उनकी अंतरंग शक्ति का प्रदर्शन मात्र है।

Radha-Ashtami

The Radha Ashtami 2024 is the most important festival for the devotees of Radha Rani. In this article, we will discuss everything about the Radha Ashtami.

The Radha Ashtami is celebrated all over India as it is one of the biggest festivals for the Radha Krishan devotees. Devotees celebrate this festival with great pleasure at a considerable level.

Radha Rani Ji is the favourite Goddess of almost all the Brajwasi (the people of the Braj area, mainly Mathura, Vrindavan, and Varsana ). Every Brajwasi and other devotees of Radha Rani eagerly wait for this festival every year.

People believe that Radha Rani is a reincarnation of Goddess Laxmi( Wife of Lord Vishnu). The Radha Rani holds an essential place in the hearts of many devotees. The devotee’s love for Radha Rani is Immeasurable.

This article will discuss the date, timing, Puja Vidhi, and significance of Radha Ashtami.

What is Radha Ashtami?

The Radha Ashtami is celebrated as the birth anniversary, the day the Goddess Radha Rani was born on earth. It was the eighth day of Shukla Paksha, the month of Bhadrapada, which falls in August and September, the day when Radha Rani.

The Radha Ashatmi falls exactly after the 15 days of Krishna Janmashtami. It is said and written in the Skanda Purana that King Vrishbhanu and his wife Keerti are a couple who do not have any children after many years of marriage.

Radha-AshtamiOnce, Vrishbhanu found Radh Rani lying on a leaf of a lotus flower near Varsana’s pond. Vrishbhanu took Radha Rani to his home and both Vrishbhanu and his wife Keerti decided to adopt baby Radha Rani. That day was considered Radha Rani’s birthday.

It is said that baby Radha Rani did not open her eyes till Baby Shree Krishna came in front of her. The first thing Radha Rani saw in the world was the face of Lord Shree Krishna.

When is Radha Ashtami 2024?

When we convert the date of Radha Ashtami from the traditional Hindu calendar, the Panchang to the current world calendar and the Gregorian calendar we find the date of Radha Ashtami is Wednesday, 11 September 2024

The Radha Ashtami falls just after the 15 days of the Krishna Janmashtami celebration.

Timing of the Radha Ashtami 2024:

According to the Hindu traditional calendar, the Panchang, Radha Ashtami will start at 11:10 pm on the 10 September 2024 and end at 11:46 pm on the 11 September 2024. Devotees should do the fasting on this festival for a long and joyful life.

The Pooja and Arti timing can be different for different states regions and areas.
People generally perform the Radha Ashtami pooja and Arti at noon.

Pooja and Arti Vidhi on Radha Ashtami:

On the sacred day of Radha Ashatmi, the devotees fast for the whole day. They clean and decorate the pooja place. After having a bath, you can wash and bathe the idol of Radha Rani with Panchamrit, which is made of five elements: yoghurt, milk, ghee, honey, and sugar.

After cleaning the idol, change the old clothes and replace them with new ones. The new clothes of Radha Rani should be shiny and colourful.

Radha-Ashtami-2You can offer dhoop, lotus flowers, Roli, kumkum, Shringaar, etc for worship and fruits, a variety of dishes, and sweets for Bhog to idols.

According to the old scripture Puran, Radha Rani should be worshipped along with Shree Krishna. It is also suggested that Radha Rani be worshipped at noon ( Madhyahna Kala), as the local devotees say and do.

After the Pooja and Arti, the devotees do nach-kirtan, and then prasad is distributed among them.

Significance of Radha Ashtami:

The Radha Ashtami is one of the biggest festivals for Radha Krishna devotees. According to old Hindu scriptures, Radha Rani and Krishna are two bodies and one soul.

It is said that if you worship Lord Krishna, you should also worship Radha Rani; otherwise, your wishes will not be fulfilled. If you Worship Radha Krishna with the same love and devotion, Lord Krishna will fulfil all your desires and wishes.

As Radha Rani’s name comes first from Lord Krishna, it is good to worship Radha Rani before Lord Krishna, this is what Lord Krishna wants. Lord Krishna is incomplete without Radha Rani, so their ”Radhey-Krishna” name is chanted together.

Devotees who worship Radha Rani with pure hearts will always receive the blessing of Lord Krishna, and their lives will be filled with joy and happiness.

Fasting on Radha Ashtami:

Fasting on the auspicious day of Radha Ashtami is considered the best way to receive the blessing of Radhey-Krishna. Many devotees fast on this day to bring joy and prosperity into their lives.

On this day, devotees wake up early in the morning, take a bath, and offer water to the sun. then they wear new or clean clothes and perform Radha Rani Pooja and Arti then do fasting the whole day.

What can we eat during the fasting:

During their fast, devotees can eat many food items. The main rule of fasting for Radha Asthtami is that one should not eat Tamsik food like alcohol, onion, garlic, and non-veg and should also avoid anger and arguments.

The devotees can eat fruits, vegetables, curd, dates, nuts, etc. Remember that devotees should be empty while performing the morning prayers of Radha Ashtami. After Pooja, you can eat the above-mentioned items.

It is not necessary to fast as all the people near you are doing; only one who has devotion and love for Radha-Krishna should fast on Radha Ashtami.

Radha Ashtami Home Celebration:

Devotees outside India or those who have no temple near their houses can perform the Radha Ashtami at home, which is relatively straightforward.

For such auspicious days, the devotees should get up early in the morning take a bath early, and then clean the area for pooja. Devotees can wear new clothes or just clean clothes for the Pooja and Arti.

After cleaning the pooja area, you have to clean the idol of Radha—Krishna with Panchamrit, which consists of five elements: milk, yoghurt, ghee, jaggery, and honey. Then, you have to clean the idol with pure water and a clean white cloth.

Radha-Ashtami-4Then you should perform the morning Pooja and Arti of Radha-Krishna’s idol. Chant the Radha Gayatri Mantra during the prayer. After Pooja, distribute the Prashadam to all your family members and neighbours.

You should perform the Radha Ashtami Pooja and rituals at noon as suggested in Scripture at noon with Radha GaytriMantra and Arti and share the Bhog and Prasad with your family and neighbours.

The Radha Ashtami celebration in Mathura:

Mathura-Vrindavan is the area of Braj where Radha Rani and Lord Krishan were born and spent most of their lives. The people of the Braj area are the true devotees of Radha-Krishna.
The Braj( Mathura, Vrindavan, Barsana, etc ) area has many sacred temples of Radha-Krishan.

The people of Braj celebrate the Radha Ashatmi in the ultimate form. They celebrate Radha Rani’s birthday with great pomp and show of Radha Rani with great joy and passion.

On the day of Radha Ashtami, the whole city is decorated with flowers and lights. The celebration is huge.

People dance and kirtan the whole day and share sweets on this auspicious day.
The celebration of Radha Ashtami goes for a whole with below things:

1. Rasleela:

The Ras Leela is a dance with storytelling in music that is performed by Radha-Krishna in the Brij Mandal.

In Ras Leela the people of Braj perform an act, telling the story of Radha-Krishna on a big stage in front of a large audience with dance and singing.

Many people gather to watch the Raslila of Radha-Krishna, which performers generally do at night after performing the pooja of Radha-Krishna.

2. Dance and Kirtan:

People dance and kirtan to celebrate the Radha Ashtami with great excitement. People of every age, whether old or young, dance to the dhol and Bhakti songs.

Mantras and Arti for Radha Ashtami:

Devotees chant Mantras during the Pooja and Arti of Radha Rani and Krishna. If you do not know any Mantras for this day, we have mentioned the Radha Ashtami Mantra and Arti below:

Radha Ashtami Mantra:

!! Om Vrashbhanujaye Vidmahe !! !! Krishnapriyaye Dhimahi !! !! Tanno Radha Prachodayat !!
वृषभानुज्यै विधमहे !! !! कृष्णप्रियायै धीमहि !! !! तन्नो राधा प्रचोदयात !!

Radha Ashtami Aarti:

आरती श्री वृषभानुसुता की |मंजु मूर्ति मोहन ममताकी || टेक ||
aarati shri vrshabhaanusuta ki | manju moorti mohan mamataaki || tek ||

त्रिविध तापयुत संसृति नाशिनि,विमल विवेकविराग विकासिनि |
trividh taapayut sansrti naashini,vimal vivekaviraag vikaasini |

पावन प्रभु पद प्रीति प्रकाशिनि,सुन्दरतम छवि सुन्दरता की ||
paavan prabhu pad preeti prakaashini,sundaratam chhavi sundarata ki ||

मुनि मन मोहन मोहन मोहनि,मधुर मनोहर मूरती सोहनि |
अविरलप्रेम अमिय रस दोहनि,प्रिय अति सदा सखी ललिताकी ||
muni man mohan mohan mohani,madhur manohar moorati sohani |
aviralaprem amiy ras dohani,priy ati sada sakhee lalitaaki ||

संतत सेव्य सत मुनि जनकी,आकर अमित दिव्यगुन गनकी,
आकर्षिणी कृष्ण तन मनकी,अति अमूल्य सम्पति समता की ||
sant seva sat muni jaanakee, aao aur amit divyagun gunaki,
akshishani krshn tan manakee, ati amooly sampati samata ki ||

कृष्णात्मिका, कृषण सहचारिणि,चिन्मयवृन्दा विपिन विहारिणि |
जगज्जननि जग दुःखनिवारिणि,आदि अनादिशक्ति विभुताकी ||
krshnaatmika, krshan sahachaarini, chinmayavrnda vipin vihaarini |
jagajjanani jag duhkhanivaarini, aadi anaadishy vibhutaaki ||

Benefits of Celebrating Radha Ashtami:

There are several benefits of celebrating the Radha Ashtami. The Radha Ashtami 2024 is the birth anniversary of Radha Rani. The day when Radha Rani was born on Earth is considered the best day for fasting and worshipping Radha Rani.

As people say, if you worship Radha Rani, Lord Krishna will be pleased with you, as Radha Rani was his beloved and soulmate. So, if you fast and Worship Radha Rani on this day with a pure heart, Lord Krishna will bless you and your family with happiness and joy.

Radha-Ashtami-5Fasting on Radha Ashtami helps purify your soul by removing your sins from your body, and chanting Mantras helps to calm and peaceful your mind.

The scientific benefit of fasting for the human body is that it can prevent many dangerous diseases. Fasting also helps to improve digestion and lose weight.

Conclusion:

The Radha Ashtami 2024 is considered one of the most important festivals for Hindus. The devotees celebrate Radha Ashtami with great pomp and show. The Radha Ashtami is the birth anniversary of Radha Rani, the day when Radha Rani was born.

Radha Rani and Lord Krishna are connected with a divine connection. They are the best couples and lovers today, and their love stories are still relevant for new generations.

People fast and pray to Radha-Krishna for happiness and wealth in their life. The people of Braj Celebrate the Radha Ashtami with great pleasure and passion. Ras Leela, dance, and kirtan are performed during the night of Radha Ashtami.

Devotees Chant Mantras during the Puja and Arti. After that, the Prasad is distributed among the devotees. They also perform dance and kirtan at night.

Devotees can also celebrate Radha Ashtami at home by following the given instructions.

Mallikarjuna jyotirlinga

Mallikarjuna Jyotirlinga is one of the most sacred temples of Hindu devotees. It is dedicated to Lord Shiva and Goddess Parvati and is located in the Kurnool district of Andhra Pradesh state. The Mallikarjuna Jyotirlinga has an ancient history, consisting of the love and devotion of the devotees to Lord Shiva, which made it possible to build this marvellous temple.

The temple is undoubtedly an example of excellent Indian architecture. The Mallikarjuna Jyotirlinga Temple is one of Lord Shiva’s 12 sacred temples, which shows its importance to devotees worldwide. About 15,000 to 20,000 devotees visit the temple daily to receive Lord Shiva’s and Goddess Parwati’s blessings.

Story Behind the Mallikarjuna Jyotirlinga Temple:

The story behind the Mallikarjuna Jyotirlinga Temple is fascinating. Legend has it that Lord Shiva and Goddess Parvati assigned a quest to their two sons, Lord Ganesha and Lord Kartikeya.

The quest was about their marriage, and one who circumambulates the earth seven times will win and get married first.

As the quest declared, lord Kartikeya sat on their vahana (vehicle), the peacock, and started their journey to circumambulate the earth.

Lord Ganesha used his intelligence and told Lord Shiva and Goddess Parvati to sit together and started circumambulating them.

When Goddess Parvati asked him what he was doing, Lord Ganesha replied you both are my world ( earth); circumambulating both of you is equal to circumambulating the earth.

Mallikarjuna-JyotirlingaThe answer of Lord Ganesha pleased both Lord Shiva and Goddess Parvati, who declared him the winner and announced the marriage of Lord Ganesh.

When Lord Kartikeya returned from circumambulating the earth after a year, he found that Lord Ganesha had married. This made Lord Kartikeya furious, and he flew away to the Kronch Parvati and then to the Srisailam.

Where Lord Shiva and Goddess Parvati came to plead with him and stay, people say that Lord Shiva came there on the night of the no moon and Goddess Parvati came there on the night of the full moon to meet their son Kartikeya.

History of Mallikarjuna Jyotirlinga Temple:

The Mallikarjuna Jyotirlinga is one of the most ancient temples in India. Many ancient rulers and emperors connected with the history of the temple by building, developing, and maintaining it, as faithful devotees of Lord Shiva.

The temple was first built by the king of the Satavahan Dynasty in 1 AD. The other devotees of Lord Shiva, Ikshvakus, Pallavas, and Redis also helped develop the temple. The Chalukyas contributed a mesmerizing and unique architectural design to the temple.

Later, Chhatrapati Shivaji, Kakatiyas, and the Vijayanagara Empire helped build more sacred places near the temple.

During the Mughal invasion period, the temple was under the control of the Mughals, who later gave it to the Nawabs of Kurnool. After the Mughal period, the temple came under the control of the Nizams of Hyderabad. 

After that, the temple came under the control of the British Empire, who later handed it over to the Newly Formed Indian government during the independence of 1947.

Architecture of the Mallikarjuna Jyotirlinga Temple:

The Mallikarjuna Jyotirlinga Temple is one of the most attractive architecture among the most beautiful temples in India. The temple, surrounded by beautiful sceneries of hills, greenery, and nature, was constructed in the Dravidian architectural style.

The temple covers an area of 2 hectares with four gateway towers called Gopurams.

These Gopurams face in all four directions. The temple has many shrines, the Mallikarjuna and Brahmrambha being the most beautiful.

Mallikarjuna-Jyotirlinga-2The Mukha Mandapa hall is the most prominent hall of the temple built in the Vijayanagar period. The centre hall has many pillars and a massive idol of Nadikeshwara.

The temple has Sahasra Lingams, 1000 Lingams of Lord Shiva built by Lord Rama, and five other Lingams built by the Pandavas.

What is the Location of the Mallikarjuna Jyotirlinga Temple?

The Mallikarjuna Jyotirlinga Temple, also known as the Kailash of South India, is located in Srisailam town in Kurnool district in Andhra Pradesh.

The hills and greenery surrounding the Mallikarjuna Jyotirlinga Temple provide devotees with a joyful experience.

What is Darshan Timing In the Mallikarjuna Jyotirlinga Temple?

It is better to know the Darshan timings of the Mallikarjuna Jyotirlinga temple before visiting the temple.

As most people and priests suggest, morning is the best time to visit the temple and get the blessing of the Lord Shiva. The different timing schedule of the temple is as follows:

Morning Timings

  • In the morning, the temple opens at 4 am.
  • The morning worship fills the devotees with positivity, which gives them new energy.
  • The morning worship with the sunrise in such a pleasant location gives the devotees an out-of-the-world feeling.

Afternoon Timings

  • For darshans, the temple is generally closed during the afternoon hours.
  • Devotees used to enjoy the hill scenery and participate in other cultural activities in the afternoon.

Evening Timings

  • The temple opens at 4:00 PM after the morning.
  • During the evening hours, Arti and rituals are performed.

Night Timings

  • The last darshan time of the temple is at 9:00 PM.
  • After the evening Pooja and Arti, the temple gates close, and people indulge in other activities.

How to Reach Mallikarjuna Jyotirlinga Temple?

The Mallikarjuna Jyotirlinga temple is located in the southern part of India, slightly distant from the northern devotees. Different types of people come to the temple using various modes of transportation.

Here are some modes of transportation to reach Mallikarjuna Jyotirlinga temple:

Flight to Mallikarjuna Jyotirlinga temple

There is no direct flight to the Mallikarjuna Jyotirlinga temple, but the nearest aeroplane terminal, Rajiv Gandhi Universal Airport, is about 250 kilometres away.

After reaching the Rajiv Gandhi Universal Airport, you can choose from different types of road transport, such as a bus, cab, or taxi.

You can find it at the Mahatma Gandhi Transport Station if you want to go by taxi. The fare of these taxis and cabs is generally higher as they give you comfortable and personal rides.

Mallikarjuna-Jyotirlinga-3If you choose the bus to reach your destination, many buses at Mahatma Gandhi Transport Station charge a reasonable fare and take 5-6 hours to reach Srisailam.

Train to Mallikarjuna Jyotirlinga temple.

The nearest railway station to the Mallikarjuna Jyotirlinga temple is Markapur Road railway station, which is about 85 kilometres away. This station has good connections to the central railway stations.

You can go with coordinated trains that connect cities like Hyderabad, Bangalore, Chennai, and Vijayawada to Markapur Street Railroad Station. Rayalaseema Express and Kacheguda Yesvantpur Express best suit pilgrims.

Buses to Mallikarjuna Jyotirlinga temple

Many buses run from different routes to Srisailam, and the Hyderabad route takes about 5-6 hours to reach Srisailam.

The Bangalore to Srisailam bus is the best option for pilgrims from Karnataka state and charges a reasonable amount.

For the pilgrims of Vijayawada, the Vijayawada to Srisailam bus is best for reaching Mallikarjuna Jyotirlinga temple.

How much time does it take for darshan in Mallikarjuna Jyotirlinga temple?

Furthermore, it generally took 30 minutes for the darshan of Lord Shiva on a regular day and 1-2 hours on an irregular day. The temple has the concept of a VIP break darshan, which generally takes 45 minutes.

On a day full of rush at the temple, darshan can take 4-5 hours, but the temple authority offers a 300 rs irregular ticket that can take 1 hour on the same day.

Darshan tickets for Mallikarjuna Jyotirlinga Temple:

The temple generally charges an amount for the darshan of Lord Shiva and Goddess Parvati. The prices of the tickets are as follows:

  • The cost for fast darshan is 300 rs per person.
  • The cost for a customary darshan is 150 rs.
  • The cost for the Sparsha darshan is 500 rs per person.

You can also book the ticket online using your government ID. You cannot cancel the ticket, but you can change the date and timing for the darshan. During the darshan, authorities check the ID on the ticket, so you cannot give your ticket to another person.

Free Darshan timing in Mallikarjuna Jyotirlinga Temple:

The authority of the Mallikarjuna Jyotirlinga temple offers two free darshan for the devotees from 6:30 am to 3:30 pm and again from 6:30 pm to 10:00 pm. The Timings may change on some special occasions or festivals.

Things to Remember for Mallikarjuna Jyotirlinga Temple Darshan:

It is better to remember the stuff before the Darshan of Mallikarjuna Jyotirlinga temple :

  • You should wear traditional Indian clothes.
  • You Should not wear fancy Western clothes.
  • You should have your ID handy for darshan.
  • Carrying food items inside the temple is restricted.
  • Carrying electronics like phones and cameras inside the temple is prohibited.

Conclusion:

Mallikarjuna Jyotirlinga temple is significant to Indian culture and the devotees of Lord Shiva. The devotees of Lord Shiva passionately built the temple, filling its history with exciting stories. The Architecture and surroundings of the temple are mesmerizing.

Therefore you Should visit the temple at least once with your family and friends to have a unique and joyful experience. Visiting the temple during the special occasion of Mahashivratri is best because the temple is filled with devotees during this time.

The temple is generally free for devotees from all over the world. You can take a VIP pass for fast darshan, which is decently priced.

Shree Nagchandreshwar Temple

Shree Nagchandreshwar Temple is located in Ujjain, Madhya Pradesh. This auspicious temple, dedicated to Lord Shiva, is located on the third floor of MahakaleshwarJyotirlinga. This temple is special as the gates of the temple opened on only Nagpanchmi. This means the temple is open for 24 hours a year. On that day thousands of pilgrims visit this coveted temple. The temple opened with special worship at midnight for the devotees.

Shree Nagchandreshwar Temple Ujjain.As per folks, during Nagpanchmi, Nagraj Takshak (king of nagas) himself resides in the temple. In India, there has been a tradition of worshipping snakes in Hinduism for centuries. According to Hindu tradition, Snakes are considered as the ornaments of Lord Shiva.

We also Provide the following Puja in Ujjain-

Pitra Dosh Puja in Ujjain.

Angarak Dosh Puja In Ujjain.

Kaal Sarp Dosh Puja in Ujjain.

Mangalnath Bhat Puja.

Graha Dosh in Ujjain.

History of Shree Nagchandreshwar Temple-

The history behind this unique and ancient temple describes the relevance of God Snake with Lord Shiva. History says that people exchanged the statue in this temple from Nepal. The people placed the Lord Shiva here along with Goddess Parvati and Lord Ganesha. The temple rests on the third floor of the world-famous Mahakal Mandir.

It is believed that the temple was built by Parmar King Bhoj in 1050 AD. After this, King Ranoji of the Scindia family in 1732 renovated and strengthened the entire structure including the Mahakal Temple and Shree Nagchandreshwar Temple.

According to Folks, Nagraj Takshak (king of Nagas) himself resides in the temple during Nagpanchmi.

Mythology Related to Shree Nagchandreshwar Temple-

According to beliefs, Takshak, the king of snakes, had performed penance to please Lord Shiva, due to which the Lord was pleased and gave the boon of immortality to Takshak Nag. Takshak is mentioned in the Hindu epic Mahabharata as well as in the Bhagavata Purana. He is described as king of the Nagas and one of the sons of Kadru.

After the boon, King Takshak started living in the company of the Lord, but before living in the Mahakal forest, his wish was that there should not be any disturbance in his solitude, hence the same tradition has been going on that only on the day of Nag Panchami They have darshan, at other times the temple remains closed as tradition.

More Places To Visit In Ujjain-

Along with Shree Mahakal Temple and Shree Nagchandreshwar Temple Ujjain, there are more places to visit near these temples such as.

Chintaman Ganesh Temple-

The Chintaman Ganesh Temple stands next to the Fatehabad railway line and the Shipra River. This Temple is a popular destination in Ujjain because people believe that the Ganesh idol worshipped here is self-manifested. Agreeing with mythology, Lord Ganesh himself came to the soil to make this Temple. 

Shree Nagchandreshwar Temple Ujjain 2The Paramar controlled Malwa and built the temple during the 11th and 12th centuries. Sita is believed to have established a unique temple.

Ram Mandir Ghat-

Ram Mandir Ghat, situated near the Harsiddhi Temple in Ujjain, is among the most well-known places to see in Ujjain. The ghat serves as one of the scenes of the Kumbh Mela, which takes place every 12 years. In connection to the Kumbh celebrations, people consider it as one of the old washing Ghats. Near Ram Mandir Ghar, multiple Aartis take place at dawn and in the evening.

Timing And Details of Shree Nagchandreshwar Temple-

Many believe that Shree Nagchandreshwar is the only temple in the world where Lord Shiva rests on a serpent bed instead of Lord Vishnu. Mahant Vineet Giri celebrates Nagpanchami with grandeur in Ujjain. The doors of Shree Nagchandreshwar will open at midnight.

The doors of Lord Shree Nagchandreshwar Mandir Ujjain will be opened at midnight on 8th August 2024 and devotees can have darshan of Shree Nagchandreshwar until midnight on 9th.

Way to Reach Shree Nagchandreshwar Mandir Ujjain-

Anyone can reach Ujjain to visit the Shree Nagchandreswar Mandir Ujjain in three ways which are, by air, by train, and by road.

By Air-

The Nearest Airport to the temple is Devi Ahilyabai Holkar Airport Indore (53 km). There are regular flights from Delhi, Mumbai, Pune, Jaipur, Hyderabad, Bhopal, and many other cities.

By Train-

Ujjain Junction railway station is the closest to Shree NagchandreshwarMandir Ujjain. There are 2 kilometres between the Ujjain Railway Station and the temple. Trains are available in many big cities.

By Road-

Pilgrims can also visit the Shree Nagchandreshwar temple by road. Regular private and government bus services connect Ujjain with Indore, Bhopal, Ratlam, Gwalior, Mandu, Dhar, Kotam, and Omkareshwar. The highways connect Ujjain with Delhi (774 km), Ahmedabad (402 km), Bhopal (183 km), Mumbai (655 km),  Gwalior (451 km), Indore (53 km) and Khajuraho (570 km) etc.

Conclusion

Ujjain is truly a mesmerising, beautiful, and religious place, covered in the holy blanket of faith and devotion, this city is truly worth visiting at least once in a lifetime. The Temple of Shree Nagchandreshwar Mandir Ujjain attracts more than 2 lacks pilgrims every year. As the wish of Nagraj Takshak to not be any disturbance in his solitude, the temple was opened on Nagapanchami a particular day in the year.

It means only one day for 24 hours in a year. It is believed that, if a person has Sarp Dosh or Kaal Dosh in his horoscope, then he should definitely visit the Shree Nagchandreshwar temple on the day of Naagpanchmi and worship it properly. By doing this one gets rid of Doshas.

Ganesh-Atharvashirsha

यह गणेश अथर्वशीर्ष एक ऐसी प्रार्थना है जो पार्वती पुत्र, गणपति को प्रशन्न करने के लिए की जाती है। जैसे कि हम सभी जानते है कि हिन्दू धर्म में प्रत्येक दिन किसी ना किसी भगवान को समर्पित किया जाता है| यदि हम बात करे बुधवार के दिन की तो यह दिन भगवन गणपति को समर्पित किया गया है, जिनकी उपासना के लिए और भगवन गणेश को प्रसन्न करने के लिए इस गणेश अथर्वशीर्ष पाठ को किया जाता है । यह एक विशेष प्रकार की पूजा, आराधना, और स्तोत्र है, जिसमें गणेशजी की महिमा, गुण, और प्राप्तियाँ व्यक्त की गई है।

बुधवार के दिन भगवन गणेश की आराधना करने से सौभाग्य की प्राप्ति होती है, यूँ तो गौरी पुत्र गणेश को प्रथम पूज्य कहा गया है जिसका मतलब है सबसे पहले स्थान पर पूजने वाले देवता।गणेश अथर्वशीर्ष कोई भी काम शुभारंभन करने से पहले भगवन गणेश को स्मरण किया जाता है तभी कोई काम सफल माना जाता है। 

Ganesh-Atharvashirshaआज इस लेख के माध्यम से आपको गणेश अथर्वशीर्ष के बारे में बताएंगे। इस गणेश अथर्वशीर्ष को प्रतिदिन नियमित रूप से करने से विग्नहर्ता आपके सारे विग्न को हर लेते है। और ऐसी मान्यता है कि बुधवार के दिन गणपति का पूजन, स्तोत्र पाठ और मंत्रोच्चारण से जातक का कल्याण होता है साथ ही सकारात्मक ऊर्जा का भी निवास रहता है। मान्यतानुसार जिस व्यक्ति की कुंडली में राहु, केतु, और शनि के भारी प्रभाव से कोई काम न बन रहा हो उसे यह गणेश अथर्वशीर्ष पाठ को अवश्य करना चाहिए।  

तो आइये इस लेख के माध्यम से जानते है गणेश अथर्वशीर्ष के बारे में हिंदी अर्थ के साथ। इस गणेश अथर्वशीर्ष के साथ ही हम आपको बताते है 99Pandit के बारे में| यदि आप हिन्दू धर्म से संबंधित किसी भी तरह की पूजा, पाठ या यज्ञ जैसे त्रिपिंडी श्राद्ध, नवरात्रि की पूजा, गृह प्रवेश पूजा, गणेश पूजन, नवग्रह शांति पूजन, आदि करवाना चाहते है तो 99Panditji आपके लिए एक बहुत ही अच्छा विकल्प होगा| जहां आपको ज्ञानी पंडित और पुरोहित के साथ जोड़कर आपकी पूजा को सफल बनाने का प्रयास करते है। 

श्री गणेश अथर्वशीर्ष हिंदी अर्थ सहित- Ganesh Atharvashirsha with Hindi Meaning

‘श्री गणेशाय नम:’

ॐ भद्रं कर्णेभि शृणुयाम देवा:।

भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्रा:।।

स्थिरै रंगै स्तुष्टुवां सहस्तनुभि::।

अर्थ- हे देववृंद, हम अपने कानों से कल्याणमय वचन सुने। जो याज्ञिक अनुष्ठानों के योग्य है ऐसे है देव, अपनी आँखों से मंगलमय कार्यों को होते देखें निरोग इन्द्रियों एवं स्वस्थ देह के माध्यम से आपकी स्तुति करते हुए हम प्रजापति ब्रह्मा द्वारा हमारे हितार्थ सौ वर्ष अथवा उससे भी अधिक जो आयु नियत कर रखी है उसे प्राप्त करें। तात्पर्य है कि हमारे शरीर के सभी अंग और इंद्रियां स्वस्थ एवं क्रियाशील बनी रहे हम सौ या उससे अधिक लंबी उम्र पायें।

ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा:।

स्वस्ति न: पूषा विश्ववेदा:।

स्वस्ति न स्तार्क्ष्र्यो अरिष्ट नेमि:।।

स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु।2।

ॐ शांति:। शांति:।। शांति:।।।

अर्थ- महान कीर्तिमान, ऐश्वर्यवान इंद्र हमारा कल्याण करें, विश्व के ज्ञान स्वरूप, सर्वज्ञ, सबके पोषणकर्ता पूषा सूर्या हमारा कल्याण करे, जिनके चक्रीय गति को कोई रोक नहीं सकता वे गरुड़ देव हमारा कल्याण करे, अरिष्टनेमि जो प्रजापति है वे सभी दुरितों को दूर करने वाले है वे हमारा कल्याण करें, वेद वाणी के स्वामी, सतत वर्घनशील बृहस्पति हमारा कल्याण करे। 

Ganesh-Atharvashirsha-2

ॐ सर्वत्र शांति स्थापित रहे।

ॐ नमस्ते गणपतये।

त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि।

त्वमेव केवलं कर्ताऽसि।

त्वमेव केवलं धर्ताऽसि।

त्वमेव केवलं हर्ताऽसि।

त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि।

त्वं साक्षादात्माऽसि नित्यम् ॥1॥

अर्थ- हे! गणेश आपको नमन। आप ही प्रत्यक्ष तत्व हो। आप ही एकमात्र कर्ता हो। आप ही एकमात्र धर्ता हो। आप ही केवल हर्ता (दुःख हरने वाला) हो। आप ही समस्त विश्वरुप ब्रह्म हो। आप स्वयं ही शाश्वत आत्मस्वरूप हो।

ऋतं वच्मि।

सत्यं वच्मि॥2॥

अर्थ- मैं यथार्थ कहता हूँ। सत्य कहता हूँ,

अव त्वं माम्।

अव वक्तारम्।

अव श्रोतारम्।

अव दातारम्।

अव धातारम्।

अवानूचानमव शिष्यम्।

अव पश्चात्तात्।

अव पुरस्तात्।

अवोत्तरात्तात्।

अव दक्षिणात्तात्।

अव चोर्ध्वात्तात्।

अवाधरात्तात्। सर्वतो मां पाहि पाहि समन्तात्॥3॥

अर्थ- हे! गणेश, आप मेरी रक्षा करो, वक्ता की रक्षा करो, श्रोता की रक्षा करो, दाता की रक्षा करो, धाता की रक्षा करो, आचार्य की रक्षा करो, शिष्य की रक्षा करो, आप पश्चिम से रक्षा करो, पूर्व से रक्षा करो, उत्तर से रक्षा करो, दक्षिण से रक्षा करो, आप आगे से रक्षा करो, आप मेरी पीछे से रक्षा करो, आप सब ओर से रक्षा करो। 

त्वं वाङ्मयस्त्वं चिन्मयः।

त्वमानन्दमयस्त्वं ब्रह्ममयः।

त्वं सच्चिदानन्दाऽद्वितीयोऽसि।

त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि।

त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि॥4॥

अर्थ- आप वाङ्मय हो, आप चिन्मय हो, आप आनंदमय हो, आप ब्रह्ममय हो, आप सच्चिदानन्द अद्वितीय परमात्मा परमेश्वर हो, आप प्रत्यक्ष ब्रम्ह हो, आप ज्ञानमय हो, विज्ञानमय हो। 

सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते।

सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति।

सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति।

सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति।

त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभः।

त्वं चत्वारि वाक् पदानि॥5॥

अर्थ- यह सारा जगत आपसे उत्पन्न होता है,यह सारा जगत आपसे सुरक्षिक रहता है, यह सारा जगत आम लीन होगा, यह अखिल विश्व आपमें ही प्रतीत होता है, आप ही भूमि जल, भूमि, अग्नि,वायु, और आकाश हो। आप ही परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी चतुर्विध वाक् (चार प्रकार की वाणी) हो। 

त्वं गुणत्रयातीतः।

त्वं अवस्थात्रयातीतः।

त्वं देहत्रयातीतः।

त्वं कालत्रयातीतः।

त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यम्।

त्वं शक्तित्रयात्मकः।

त्वां योगिनो ध्यायन्ति नित्यम्।

त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं रुद्रस्त्वमिन्द्रस्त्वमग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चन्द्रमास्त्वं ब्रह्म भूर्भुवस्सुवरोम्॥6॥

अर्थ- आप सत्व, राज, तम इन तीनो गुणों से परे हो, आप स्थूल, सूक्ष्म और कारण इन तीनो देह से परे हो, आप भूत, भविष्य, वर्तमान इन तीनो कालो से परे हो, आप नित्य मूलाधार चक्र में स्थित हो, आप प्रभु शक्ति, उत्साह शक्ति, मंत्र सकती इन तीनो शक्तियों से संयुक्त हो, योगीजन नित्य आपका ध्यान करते है, ऋषिमुनिगण नित्य आपका ध्यान करते है, आप ब्रह्मा हो, विष्णु हो, रूद्र हो, आप इंद्र हो, आप अग्नि हो, आप वायु हो, आप सूर्य हो, आप चण्द्रमा हो, आप ही सगुण ब्रह्मा हो, आप ही निर्गुण त्रिपाद, भू, भुवः, स्वः और प्रणव (ॐ) हो। 

Ganesh-Atharvashirsha-3

गणादिं पूर्वमुच्चार्य वर्णादींस्तदनन्तरम्।

अनुस्वारः परतरः।

अर्धेन्दुलसितम्।

तारेण ऋद्धम् ।

एतत्तव मनुस्वरूपम्।

गकारः पूर्वरूपम्।

अकारो मध्यरूपम्।

अनुस्वारश्चान्त्यरूपम्।

बिन्दुरुत्तररूपम्।

नादः सन्धानम्।

संहिता संधिः।

सैषा गणेशविद्या।

गणक ऋषिः।

निचृद्गायत्रीच्छन्दः।

गणपतिर्देवता।

ॐ गं गणपतये नमः॥7॥

अर्थ- गण के आदि अर्थात ‘ग्’ कर पहले उच्चारण करे। उसके बाद वर्णो के आदि अर्थात ‘अ’ उच्चारण करे। उसके बाद अनुस्वार उच्चारित होता है। इस प्रकार अर्धचंद्र से सुशोभित ‘गं’ ॐकार से अवरुद्ध होने पर तुम्हारे बीज मंत्र का स्वरुप (ॐ गं) है। गकार इसका पूर्वरूप है। बिंदी उत्तररूप है। नाद संधान है। संहिता संविध है। ऐसी यह गणेश विद्याहै। इस महामंत्र के गणक ऋषि है। निचृद-गायत्री छन्द है।  श्री गणपति  देवता है। वह महामंत्र है- ॐ गं गणपतये नमः।

एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि।

तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्॥8॥

अर्थ- एकदन्त (एक दांत वाले) को हम जानते है, वक्रतुण्ड का हम ध्यान करते है।  वह दंति ( गजानन) हमे प्रेरित करते है। 

एकदन्तं चतुर्हस्तं पाशमङ्कुशधारिणम्। रदं च वरदं हस्तैर्बिभ्राणं मूषकध्वजम्॥

रक्तं लम्बोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम्। रक्तगन्धानुलिप्ताङ्गं रक्तपुष्पैस्सुपूजितम्॥

भक्तानुकम्पिनं देवं जगत्कारणमच्युतम्।

आविर्भूतं च सृष्ट्यादौ प्रकृतेः पुरुषात्परम्।

एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वरः॥9॥

अर्थ- एकदंत चतुर्भुज चरों हाथों में पाक्ष, अंकुश, अभय और वरदान की मुद्रा धारण किये तथा मूषक चिन्ह की ध्वजा लिए हुए, रक्तवर्ण लम्बोदर वाले सूप जैसे बड़े-बड़े कानों वाले रक्त वस्त्रधारी शरीर पर रक्त चंदन का लेप किये हुए रक्तपुष्पों से भलीभांति पूजित।भक्त पर अनुकम्पा करने वाले देवता , जगत के कारण अच्युत, श्रष्टि के आदि में अविर्भूत प्रकृति और मनुष्य से परे, श्री गजानन जी का जो नित्य ध्यान करता है, वह योगी सभी योगियों में उच्च है।

नमो व्रातपतये नमो गणपतये।

नम: प्रथमपत्तये।।

नमस्तेऽस्तु लंबोदारायैकदंताय विघ्ननाशिने शिव सुताय।

श्री वरदमूर्तये नमोनम:।।10 ।।

अर्थ- व्रातपति को मेरा प्रणाम, गणपति को मेरा नमन, एकदंत को मेरा नमन, प्रथम पति अर्थात शिवजी के गणों के अधिनायक को मेरा नमन,  लंबोदर, एकदंत, शिवजी के पुत्र तथा श्री वरदमूर्ति को प्रणाम है।

एतदथर्वशीर्ष योऽधीते।। स: ब्रह्मभूयाय कल्पते।।

स सर्वविघ्नैर्न बाध्यते स सर्वत: सुख मेधते।। 11।।

अर्थ- यह अथर्वशीर्ष अथर्ववेद का उपनिषद है। इसका जो भी पाठ करता है, ब्रह्म को प्राप्त करने का अधिकारी होता है। किसी भी प्रकार के विघ्न उसके लिए बाधक नहीं होते। वह सब जगह सुख पाता है। वह पांचों प्रकार के महान पातकों तथा उपपातकों से मुक्त हो जाता है।

सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति।।

प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति।।

सायं प्रात: प्रयुंजानो पापोद्‍भवति।

सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति।।

धर्मार्थ काममोक्षं च विदंति।।12।।

अर्थ- सायंकाल पाठ करने वाला दिन के पापों का नाश करता है। प्रातः काल पाठ करने वाला रात्रि के पापों का नाश करता है। जो प्रातः, सायं दोनों समय इसका पाठ करता है वह निष्पाप हो जाता है। वह सर्वत्र विघ्नों का नाश कर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त करता है।

इदमथर्वशीर्षम शिष्यायन देयम।।

यो यदि मोहाददास्यति स पापीयान भवति।।

सहस्त्रावर्तनात् यं यं काममधीते तं तमनेन साधयेत।।13 ।।

अर्थ- इस अथर्वशीर्ष को जो अनुयायी न हो उसे नहीं देना चाहिए। जो मोह के कारण देता है वह पातकी हो जाता है। हजार बार पाठ करने से जिन कामों का उच्चारण करता है, उनकी सिद्धि इसके द्वारा ही मनुष्य कर सकता है।

Ganesh-Atharvashiraha-4

अनेन गणपतिमभिषिं‍चति स वाग्मी भ‍वति।।

चतुर्थत्यां मनश्रन्न जपति स विद्यावान् भवति।।

इत्यर्थर्वण वाक्यं।। ब्रह्माद्यारवरणं विद्यात् न विभेती

कदाचनेति।।14।।

अर्थ- इसके द्वारा जो श्री गणेश को स्नान कराता है, वह वादन्य बन जाता है। जो चतुर्थी तिथि को व्रत करके जाप करता है वह विद्यावान हो जाता है, यह अथर्व वाक्य है जो इस मंत्र के द्वारा तपश्चरण करना जानता है वह कदापि भय को प्राप्त नहीं होता।

यो दूर्वां कुरैर्यजति स वैश्रवणोपमो भवति।।

यो लाजैर्यजति स यशोवान भवति।। स: मेधावान भवति।।

यो मोदक सहस्त्रैण यजति।

स वांञ्छित फलम् वाप्नोति।।

य: साज्य समिभ्दर्भयजति, स सर्वं लभते स सर्वं लभते।।15।।

अर्थ- जो दूर्वांकुर के द्वारा भगवान गणपति का यज्ञ करता है वह कुबेर के समान हो जाता है। जो लाजो के द्वारा यज्ञ करता है वह यशस्वी होता है, मेधावी होता है। जो हजार) लड्डुओं द्वारा यज्ञ करता है, वह इच्छित फल को प्राप्त करता है। जो रोगन के सहित समिधा से यज्ञ करता है, वह सब कुछ प्राप्त करता है।

अष्टो ब्राह्मणानां सम्यग्राहयित्वा सूर्यवर्चस्वी भवति।। 

सूर्य गृहे महानद्यां प्रतिभासंनिधौ वा जपत्वा सिद्ध मंत्रोन् भवति।।

महाविघ्नात्प्रमुच्यते।। महादोषात्प्रमुच्यते।। महापापात् प्रमुच्यते।

स सर्व विद्भवति स सर्वविद्भवति। य एवं वेद इत्युपनिषद।।16।।

।। अर्थर्ववैदिय गणपत्युनिषदं समाप्त:। ।

अर्थ- आठ ब्राह्मणों को सभी रीति से भोजन कराने पर दाता सूर्य के समान प्रभावशाली होता है। सूर्य ग्रहण में प्रतिमा के पास मंत्र जपने से मंत्र सिद्धि होती है। यह महाविघ्न से मुक्त हो जाता है। 

श्री गणेश अथर्वशीर्ष का महत्व- 

गणपति अथर्वशीर्ष अथर्ववेद का एक उपनिषद पाठ है जो बुद्धि और शिक्षा के देवता भगवान गणेश को समर्पित है। मान्यता है कि गणेश अथर्वशीर्ष का जाप करने से व्यक्ति के दुख दूर होते है, तथा उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है। पाठ का जाप करने से भगवान गणेश के साथ व्यक्ति के संबंध को गहरा करने में मदद मिलती है। गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करने से छात्रों को पढ़ाई के प्रति ध्यान एकत्रित करने में सहायक होता है।

यह छात्रों को अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करने और परीक्षा की तैयारी कर रहे युवाओं को सफल होने में मददगार है। यह उन लोगों के लिए भी विशेष रूप से फायदेमंद है जिनके जीवन पर राहु, केतु या शनि ग्रहों का नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इस पाठ को श्री गणपति अथर्वशीर्ष, गणपति उपनिषद या केवल अथर्वशीर्ष के नाम से भी जाना जाता है। 

गणेश अथर्वशीर्ष क्यों करना चाहिए-Why should Ganesh Atharvashirsha be done?

सभी देवी-देवताओं में प्रथम पूज्य, विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश की प्रति बुधवार को पूजा, मंत्रौच्चारण, और अथर्वशीर्ष पाठ करने से व्यक्ति का कल्याण होता है, और उसके जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। यह अथर्वशीर्ष गौरी पुत्र को समर्पित एक वैदिक प्रार्थना है। आइये जानते है इसके लाभ किन लोगो को मिलते है। 

जिस व्यक्ति की कुण्डली में राहु, केतु, और शनि के नकारात्मक प्रभाव से उनके जीवन में कोई काम ना बन रहा हो तो उनके लिए यह पाठ अतियंत लाभदायक माना जाता है। गणेश अथर्वशीर्ष पाथ को प्रति बुधवार नियमित रूप से करने से व्यक्ति की सभी समस्याएँ दूर हो जाती है। 

गणेश अथर्वशीर्ष पाठ करने की विधि- Method of reciting Ganesh Atharvashirsha

इस गणेश अथर्वशीर्ष पाठ को करने की विधि कुछ इस प्रकार है, पाठ को विधिपूर्वक करने से अधिक लाभ की प्राप्ति होती है। पाठ को करने के लिए, प्रतिदिन सुबह स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनकर पूजा घर में आसन बिछाकर बैठना चाहिए। पाठ को बिलकुल सच्चे भाव और शांत मन से करना चाहिए। मान्यता है कि प्रथम पूज्य श्री गणेश जी के खास दिनों जैसे संकष्टी चतुर्थी और बुधवार के दिन इसका 21 बार पाठ किया जाये तो शुभ फल मिलता है।

निष्कर्ष

इस लेख में हमने जाना कि श्री गणेश अथर्वशीर्ष का महत्व और लाभ क्या है। गणेश अथर्वशीर्ष कोई आम पाठ भी है, बल्कि जीवन का एक मूल रूप है। प्रतिदिन पाथ को करने से मन को सुख-शांति और सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि रोज शाम को इस पाठ को करने से दिन में किए गए पाप नष्ट हो जाते हैं और सुबह में अध्ययन करने से रात में किए गए पाप नष्ट हो जाते हैं। दोनों समय अध्ययन करने और गहन चिंतन करने से पापी व्यक्ति भी पापरहित हो जाता है। सर्वत्र अध्ययन करने से बाधाएं दूर होती हैं।

 

Govind-Dev-ji-temple-jaipur

The city of Jaipur is full of many religious places and temples. This blog is all about the Govind Dev Ji temple. The Govind Dev Ji Temple is among the most popular temples in Jaipur and is dedicated to Lord Shree Krishna. The temple holds importance for every devotee due to its history.

The city of Jaipur is full of many religious places and temples. This article is all about the Govind Dev Ji temple. 

The Govind Dev Ji Temple is among the seven famous temples of Lord Krishna, which include Prem Mandir, Dwarkadhish Temple, and others.

The Govind Dev Ji temple holds amazing architecture that was built by King Man Singh in 1590 AD.

The temple is situated in the middle of the city, near the Hawa Mahal and City Palace Complex.

Why is the Govind Dev Ji temple important?

The temple is among the seven temples of Lord Shree Krishna. Many people say that the face of the portrait is the same as that of Lord Shree Krishna himself. It was built by the king of Jaipur, Swai Man Singh.

Positive divine energy surrounds the temple, attracting devotees from all over the world. Devotees lose themselves in the love of Lord Shree Krishna.

Govind-Dev-ji-templeThe Mughal emperor Akbar donated the same red stone used in Agra Fort to build the temple. During Akbar’s rule, the temple had seven floors, but Aurangzeb later destroyed it to have three floors, as we see now.

History of Govind Dev Ji Temple:

The Govind Dev at the temple holds a fascinating history. The Mughal emperor destroyed the temple in Vrindavan where the idol of the Lord Govind Dev was first situated. The idol was then safely shifted to Jaipur, where the king of Jaipur, Raja Swai Man Singh ll, protected it.

People say that the Mughal Emperor Akbar helped build the temple as he was a devotee of Lord Shree Krishna. He donated about 135 acres of land for the development of the temple.

The idol of Lord Govind Dev Ji was created about 5600 years ago by 13-year-old Shree Bajarnath Ji, the great-grandson of Lord Shree Krishna.

The Architecture of the Govind Dev Ji Temple:

The Govind Dev Ji Temple showcases amazing architecture, blending Rajasthani and Muslim architectural styles with classic Indian elements.

The temple, constructed with red stone and resting on a foundation 12 meters deep, features a ceiling adorned with gold, enhancing the temple’s beauty. The temple covers an area of 117 feet from east to west, 117 feet in length, and 105 feet from north to south, which stands in 8 columns.

The Satsang Hall is one of the main highlights of the temple, which covers an area of 118 by 124 feet. The construction used about 290 tons of steel and 2000 cubic meters of concrete. The workers crafted the hall’s roof with the same painting as the walls, taking 36 hours to set it down.

Satsang Hall was built for the devotees to perform bhajan and kirtan. The hall is too big to handle the crowd of thousands of devotees at a time. It took 383 days to complete the construction of the Satsang Hall. The cost of construction was about $3 million. The Satsang Hall holds the Guinness Book of World Records for being the world’s widest single-span R.C.C. flat roof.

Govind Dev ji Temple Location:

The Govind Dev Ji Temple stands at the centre of the city. The location of the temple is perfect for tourists and the people of Jaipur. The temple’s location surrounds the main tourist attractions like Hawa Mahal, Jantar-Mantar, and the City Palace, making it easy for tourists to reach there.

The temple sits close to the Jaleb Chowk, within the City Palace Complex amidst the Chandra Mahal and Badal Mahal. Visitors can come from two different entrances through big wooden doors. The Jaipur junction and the bus stop are at a distance of 7 km from the temple.

Govind Dev JI Temple Timing:

The best time to visit the temple is in the morning to make a fresh start to the day with the blessing of the Lord Shree Krishna, which fills the soul with positivity and new hopes. Also, the legend says that morning is the best time for prayer and manifestation.

The temple timing is 4:30 a.m. to 12:00 p.m. and 5:45 p.m. to 9:30 p.m. during the summer 5:00 a.m. to 12:15 p.m. and 5:00 p.m. to 8:45 p.m. during the winter.

The arti timing of the morning Mangla aarti begins at 4:30 AM, followed by the Dhoop and Shringar aartis at 7:30 AM and 9:30 AM, respectively.

Govind Dev Ji Festivals and Celebrations:

There are many festivals in Hinduism, and the authority of Govind Dev Ji Temple celebrates most of them. The main festivals in the Hindu religion are Holi, Diwali, and Krishna Janmashtami.

Many people come to celebrate Krishna Janmashtami in the Govind Dev Ji temple. During the celebration of Krishna Janmashtami, people decorate the whole area near the temple with flowers and lighting. There are big and long lines of devotees to join the arti in the early morning. The temple authority gives Paag and Panjeeri to all the devotees on this day.

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A team of people hangs a beautiful pot full of curd decorated with flowers and colour, called “Dahi-Handi,” on a height to blow it up. The team that successfully blew the pot got the prize.

The Holi festival is one of the main festivals for Hindus. On the day of Holi, many people came to celebrate Holi in the corridor of the Govind Dev at the temple with colours and love. Every devotee who reaches the temple in the morning receives Prashad.

Cost of Entering Govind Dev JI Temple:

The Govind Dev at the temple in Jaipur is free of charge. Any devotee with a pure heart can enter the temple freely whenever it is open and pray for happiness and prosperity in his life.

What is the best month to visit Govind Dev Ji Temple?

There is no specific month or period when to visit the Govind Dev Temple, but people often suggest visiting the temple between September and March, which is considered the best time.

There is such a beautiful climate and a pleasant view that it attracts visitors and brings a vast number of people to the temple. People like to enjoy the fair architecture and scenic views of the temple and nearby palaces and mountains. 

Attractions Near the Govind Dev Ji Temple:

Govind Dev Ji Temple is near some of the tourist attractions that one can
visit after visiting the temple. The places are listed below as
good information:

  • Hawa Mahal
  • Jantar Mantar
  • Jal Mahal
  • Nahargarh Fort
  • Amer Fort
  • Birla Temple

Dress Code:

Govind Dev at the Temple worships Lord Shree Krishna as one of the holiest temples. The devotees need to have a normal and respectful dress code to maintain the decorum of the temple.

Devotees can avoid wearing highly fancy clothing for this occasion. It is appropriate to not wear irrelevant clothes on this occasion. 

Devotees visiting Govind Dev at the temple should consider wearing clothes as per the weather conditions. The weather conditions in Jaipur city during May and June are usually hot and humid. Devotees should consider wearing airy and comfortable fabrics such as linen and cotton.

Conclusion:

The Govind Dev at the temple is one of the most important temples of Lord Shree Krishna, as the temple has the real idol of Lord Shree Krishna, as people say. The temple has a remarkable history and records. The architecture of the temple is so mesmerizing and beautiful that it holds a grand hall.

The location of the temple is so perfect for tourists and locals, which makes the visit more convenient. People can also visit other places near the Govind Dev at the temple.

The timing of the Govind Dev at the temple is perfect for the office-going person and other devotees to be safe from the daytime climate.

People celebrate all the Hindu festivals in the Govind Dev at the temple, especially Holi and Krishna Janmashtami, with pomp and show. There is no charge for visiting the temple. One should wear simple or classic Indian attire to visit the Govind Dev at the temple.